पाठ्यक्रम: GS3/बुनियादी ढांचा; ऊर्जा
संदर्भ
- भारत ने चीन के साथ मिलकर वर्ष 2025 में अपने ऊर्जा क्षेत्र में ऐतिहासिक परिवर्तन देखा, जहाँ नवीकरणीय ऊर्जा में अभूतपूर्व वृद्धि के कारण जीवाश्म ईंधन-आधारित विद्युत उत्पादन में गिरावट आई। यह वैश्विक ऊर्जा संक्रमण में एक महत्वपूर्ण माइलस्टोन है।
वैश्विक मुख्य बिंदु
- सौर ऊर्जा प्रमुख वृद्धि चालक: वर्ष 2025 में वैश्विक विद्युत मांग वृद्धि का लगभग 75% सौर ऊर्जा द्वारा पूरा किया गया।
- नवीकरणीय ऊर्जा ने कोयले को पीछे छोड़ा: वैश्विक विद्युत उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी रिकॉर्ड 33.8% तक पहुँची, जो कोयले (33.0%) से अधिक है। यह 100 वर्षों में प्रथम बार हुआ।
- जीवाश्म ईंधन स्थिरता: वर्ष 2025 में जीवाश्म ईंधन-आधारित विद्युत उत्पादन में −0.2% परिवर्तन दर्ज किया गया, जो वैश्विक स्तर पर जीवाश्म उत्पादन के ठहराव को दर्शाता है।
भारत-विशिष्ट निष्कर्ष
- जीवाश्म उत्पादन में गिरावट: भारत का जीवाश्म ईंधन-आधारित विद्युत उत्पादन वर्ष 2025 में 3.3% घटा। यह विगत वर्षों की सतत वृद्धि प्रवृत्ति से एक महत्वपूर्ण विचलन है और विद्युत मिश्रण में संरचनात्मक परिवर्तन को इंगित करता है।
- नवीकरणीय ऊर्जा वृद्धि: नवीकरणीय विद्युत उत्पादन में 24% की वृद्धि हुई। प्रथम बार सौर ऊर्जा ने जलविद्युत को पीछे छोड़कर भारत का सबसे बड़ा स्वच्छ ऊर्जा स्रोत बनने का स्थान प्राप्त किया।
- रिकॉर्ड सौर क्षमता स्थापना: भारत ने वर्ष 2025 में 38 गीगावाट सौर क्षमता स्थापित की, जिससे वह अमेरिका को पीछे छोड़कर वैश्विक स्तर पर चीन के बाद दूसरे स्थान पर रहा।
- वैश्विक महत्व: चीन के साथ मिलकर भारत की स्वच्छ ऊर्जा वृद्धि ने वैश्विक जीवाश्म ईंधन उत्पादन की वृद्धि को रोकने में निर्णायक भूमिका निभाई।
परिवर्तन के पीछे कारक
- अनुकूल जलवायु परिस्थितियाँ:
- अच्छा मानसून: जलविद्युत उत्पादन में वृद्धि
- हल्की गर्मी: विद्युत मांग में कमी (कम शीतलन भार)
- तीव्र सौर परिनियोजन: सशक्त नीतिगत प्रोत्साहन और घटती सौर लागत ने स्थापना को तेज किया।
चुनौतियाँ: वर्ष 2026 की संभावनाएँ
- कमज़ोर मानसून का पूर्वानुमान: भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने सामान्य से कम वर्षा का अनुमान लगाया है, जिससे जलविद्युत उत्पादन घट सकता है, भूजल पंपिंग बढ़ सकती है, विद्युत मांग बढ़ सकती है और गर्मी के कारण एयर कंडीशनिंग का उपयोग बढ़ सकता है। इससे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता पुनः बढ़ सकती है।
- प्रेषण बाधाएँ: जीवाश्म-आधारित विद्युत उत्पादन के साथ मूल्य समानता (एक मूल्य) तभी संभव है जब ग्रिड भीड़भाड़ न्यूनतम हो। अन्यथा क्षेत्रीय मूल्य भिन्नताएँ (मार्केट स्प्लिटिंग) बनी रह सकती हैं।
- संस्थागत प्रतिरोध: पावर एक्सचेंज अपनी स्वायत्तता और राजस्व हानि से चिंतित हैं। कार्यान्वयन की जटिलता के लिए उन्नत एल्गोरिद्म, वास्तविक समय समन्वय और सशक्त नियामक निगरानी आवश्यक है।
आगे की राह: भारत में ‘मार्केट कपलिंग’ और ‘वन ग्रिड, वन प्राइस’
- वर्तमान में भारत में अनेक पावर एक्सचेंज हैं, और प्रत्येक एक्सचेंज स्वतंत्र रूप से बोली के आधार पर विद्युत मूल्य निर्धारित करता है। इससे एक ही समय स्लॉट में विभिन्न एक्सचेंजों पर मूल्य भिन्नता उत्पन्न होती है।
- मार्केट कपलिंग सभी एक्सचेंजों की खरीद और बिक्री बोलियों को एकत्रित कर निर्धारित करती है:
- एक समान मार्केट-क्लियरिंग प्राइस (MCP)
- ग्रिड में विद्युत का सर्वोत्तम आवंटन
‘वन ग्रिड, वन प्राइस’ को सक्षम करने में मार्केट कपलिंग की भूमिका
- एकीकृत मूल्य खोज: सभी बिड्स/बोलियों (खरीदार और विक्रेता) को एकत्रित कर एक एल्गोरिद्म पूरे बाजार के लिए एक मूल्य निर्धारित करता है। इससे एक्सचेंजों के बीच मूल्य असमानता समाप्त होती है।
- प्रेषण का कुशल उपयोग: क्षेत्रों में विद्युत प्रवाह का अनुकूलन होता है और प्रेषण गलियारों में भीड़भाड़ व बाधाएँ कम होती हैं।
- बेहतर प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता: विक्रेता बड़े, एकीकृत पूल में प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे बाजार विखंडन और हेरफेर रोका जाता है।
- डिस्कॉम्स के लिए लागत में कमी: एक्सचेंजों के बीच आर्बिट्राज अवसर समाप्त होते हैं। डिस्कॉम्स को राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध न्यूनतम मूल्य तक पहुँच मिलती है।
- नवीकरणीय ऊर्जा का बेहतर एकीकरण: सौर/पवन ऊर्जा परिवर्तनशील होती है। एकीकृत बाजार अधिशेष नवीकरणीय ऊर्जा को अवशोषित करने और क्षेत्रों में घाटे को संतुलित करने में सहायता करता है।
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